कल जब मैं अपने घर के पीछे की पहाड़ी पर बैठे- बैठे कुदरत के खूबसूरत नजारो को निहार रहा था, तो मैने देखा की आस पास की जंगली फूलों की झाड़िया रंग बिरंगी तितलियों से आबाद है।
तितली •••सिर्फ नाम सुनकर ही हमारे मन में कुदरत की एक सुन्दर संरचना की तस्वीर ऊभर आती है। कितनी नाजुक सी रचना है यह तितली! उसको छूने भर से डर लगता है कि कहीं कोई चोट न लग जाए। उसके रंग बिरंगे मखमल से कोमल पंख , बेहद खुबसूरती से तरासा तन, उसकी चंचलता सचमुच आखों को कितना सकुन देती हैं शब्दों में बयाँ करना बहुत मुश्किल है।
तितलियों का जीवन बहुत छोटा-सा होता है परन्तु उनकी यह जिन्दगी कितनी सुन्दर और सार्थक होती है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता हैं कि पग- पग पर मौत के साये के साथ भी यह कितनी बेखौफ़ और स्वतंत्र रूप से विचरती है। न जाने कब कौन सा शिकारी पक्षी उसे अपना आहार बना लें इस बात से बेखबर वह अपनी जिंदगी को अपनी ही धुन में मस्त होकर जीती है।
तितली की यह जीन्दगी सचमुच कितनी सुन्दर और प्रेरक है।काश हमारी जिन्दगी भी कुछ ऐसी हो जो तितली की तरह बेखौफ़ हो। हम लोग मरने से पूर्व ही अपनी मौत को जीन्दगी पर हावी करके सिर्फ मौत के इन्तज़ार में ही जिन्दगी गुजार देते हैं।
क्यों न हम कुछ इस तरह से जियें की जीन्दगी की अनिश्चितता का डर ही खत्म हो जायें। जितना भी जियें सिर्फ अपनी तरह जियें, ना कहीं भय हो, हर समय, हर जगह, हर परिस्थिति में दुख के अहसास को मिटाकार!
तितली •••सिर्फ नाम सुनकर ही हमारे मन में कुदरत की एक सुन्दर संरचना की तस्वीर ऊभर आती है। कितनी नाजुक सी रचना है यह तितली! उसको छूने भर से डर लगता है कि कहीं कोई चोट न लग जाए। उसके रंग बिरंगे मखमल से कोमल पंख , बेहद खुबसूरती से तरासा तन, उसकी चंचलता सचमुच आखों को कितना सकुन देती हैं शब्दों में बयाँ करना बहुत मुश्किल है।
तितलियों का जीवन बहुत छोटा-सा होता है परन्तु उनकी यह जिन्दगी कितनी सुन्दर और सार्थक होती है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता हैं कि पग- पग पर मौत के साये के साथ भी यह कितनी बेखौफ़ और स्वतंत्र रूप से विचरती है। न जाने कब कौन सा शिकारी पक्षी उसे अपना आहार बना लें इस बात से बेखबर वह अपनी जिंदगी को अपनी ही धुन में मस्त होकर जीती है।
तितली की यह जीन्दगी सचमुच कितनी सुन्दर और प्रेरक है।काश हमारी जिन्दगी भी कुछ ऐसी हो जो तितली की तरह बेखौफ़ हो। हम लोग मरने से पूर्व ही अपनी मौत को जीन्दगी पर हावी करके सिर्फ मौत के इन्तज़ार में ही जिन्दगी गुजार देते हैं।
क्यों न हम कुछ इस तरह से जियें की जीन्दगी की अनिश्चितता का डर ही खत्म हो जायें। जितना भी जियें सिर्फ अपनी तरह जियें, ना कहीं भय हो, हर समय, हर जगह, हर परिस्थिति में दुख के अहसास को मिटाकार!
